निर्मल जलकण
///निर्मल जलकण///
रवि रश्मियों का उत्ताप शोष,
उदधि बने वाष्प तुम अनदेखे।
क्या भय तुमको इस दुनिया से,
जो उड़ जाते हो यूं बिन लेखे।।
मंदाकिनी सी झरे प्राणांचल से,
उदित भाग्य-सुधा भू-अन्तर की।
उर वसुधा के निष्पंद ध्वनि पर,
चढ़ राह देख रहे प्रलयंकर की?।।
तेरे जलकण मेरे पाटों को,
जल देकर बना देते निर्झर।
मेरा मन अन्तर अर्पित जीवन,
बन जावे दुर्वाधर शुभंकर।।
मेघ मलय की सुरभित वाती,
गा मंद्र रव तोड़ती तेरा मौन।
छिन सके जो मुझसे संगीत,
ऐसा जगत में पसरा है कौन।।
लेकर प्राणों के दीप शिखा के,
यह बरसते पुनः धरा पर उन्मन।
आवेश सघन हो जाते क्षण में,
बनकर पुष्टिकर निर्मल जलकण।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट(मध्य प्रदेश)