मां
दर्द को पीने की वह कला सिखाती है !
मां आज भी मुझे जीना सिखाती है !!
बचपन की तरह वह अब…
कोमलता से हाथ नही पकड़ती है !
ना ही मेरे शरीर को बाहों में जकड़ती है !!
मेरे बड़े होने का भी अहसास उसे नही है…
उसका अंधा प्रेम मुझे गोद लेने के लिए तड़पता है !
पर मेरी बढ़ती काया और उम्र से वह डरता है !!
अब ना वो मुझ पर ममता बरसाती !
ना बचपन की तरह छाती से लगा पाती !!
समय ने हमारे मध्य विचारों के अंतर यानी…
मत – मतांतर की कई सारी लक्ष्मण रेखाएं खींच दी है !
हम एक नही अलग है पर फिर भी कमाल है …
वो मेरे दुखों को अपने आशीषों से इस तरह हरती है !
कि गिर ना जाऊं कहीं भव सागर में ?
इसीलिए रोज मंत्रो का जाप करती है !!
• विशाल शुक्ल