*युग*

डॉ अरूण कुमार शास्त्री एक अबोध बालक अरूण अतृप्त
युग
अहसास – ही सहारा अहसास ही किनारा ।
तुम मिले मिल कर चले हम साथ ।
उद्भव हुआ एक युग का , था नवल ये प्रयास ।
छू लिया मन का वो कोना , ढूंढता था जो खिलौना ।
पाकर जिसे फिर रहे न कोई प्यास ।
अहसास – ही सहारा अहसास ही किनारा ।
तुम मिले मिल कर चले हम साथ ।
आज तृप्ति ने लिखा है सुख मिला है, सुख मिला है।
तन मन आत्मा प्रसन्न अंतर्मन अब शान्त हुआ है ।
आज तृप्ति ने लिखा है। सुख मिला है सुख मिला है।
वेदना मिट गई, साधना पूरी हुई है।
था नवल ये प्रयास ।
छू लिया मन का वो कोना , ढूंढता था जो खिलौना।
पाकर जिसे फिर रहे न कोई प्यास ।
अहसास – ही सहारा अहसास ही किनारा ।
तुम मिले मिल कर चले हम साथ ।
आज तृप्ति ने लिखा है सुख मिला है, सुख मिला है।
तन मन आत्मा प्रसन्न अंतर्मन अब शान्त हुआ है ।
लाखों मिले यूँ तो जगत में और मिलते ही रहेंगे।
संतुष्टि जो मिली ज़ाहिर है वो किसी और से पा न सकेंगे।
किसी एक ही व्यक्ति को समर्पित ये गहरा अहसास।
तुम मिले मिल कर चले हम साथ ।
उद्भव हुआ एक युग का, था ये नवल प्रयास।
वेदना से पीड़ित सकल संसार है , वेदना मिट जाए सबकी ये तो इक अटपटी सी बात है।
मृत्युंजय सिद्धांत प्रतिबंधित है जगत में प्रभु कीर्तन ही
इक राग है इस विषय में, देगा जो मधुमास।
राग छेड़ो द्वेष छोड़ो इस अबोध बालक से ले लो तुम अमर मंत्र सदभाव।
चित्त की चिन्ता मिटा लो बात को महसूस कर लो, विरक्ति का है यही एक अनुपम मार्ग।
छू लिया मन का वो कोना , ढूंढता था जो खिलौना।
पाकर जिसे फिर रहे न कोई प्यास ।
अहसास – ही सहारा अहसास ही किनारा ।
तुम मिले मिल कर चले हम साथ ।
आज तृप्ति ने लिखा है। सुख मिला है सुख मिला है।
वेदना मिट गई, साधना पूरी हुई है।
था नवल ये प्रयास ।