जब कभी आपसी बहस के बाद तुम्हें लगता हो,
मांगी जन्नत सिरहाने मैने मेरे.....
भोली बाला
डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, प्रेम
जाति धर्म के नाम पर, चुनने होगे शूल ।
चाँदनी रातों में बहार-ए-चमन,
ये सोच कर ही पुरुषों ने पूरी उम्र गुजार दी
समसामायिक दोहे
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
*छपना पुस्तक का कठिन, समझो टेढ़ी खीर (कुंडलिया)*
কবিতা : করুণার আশে, রচয়িতা : সোহম দে প্রয়াস।
पल्लव से फूल जुड़ा हो जैसे...
स्त्री का तो बस चरित्र ही नहीं
एक खबर है गुमशुदा होने की,