राजनीति का मंच
बड़े पेड़ों के नीचे छांव,
सपनों से सजी यह धरती महान।
हिमालय से सागर तक फैली,
भारत की गाथा अनगिनत खेली।
राजनीति का यह रंगमंच,
जहां सच और झूठ का होता संशय।
वादों की गूंज, नारे बुलंद,
पर क्या सुलझे आम जन का द्वंद्व?
किसान के खेत, मजदूर की राह,
युवाओं के सपने, अधूरी चाह।
सत्ता के गलियारों में बातें घूमें,
पर जमीं पर हालात क्यों झूमें?
कमल खिला है, लहर तेज़ है,
पर फूट रहे सवाल कई आज भी।
विविधता संग टकराव के स्वर,
त्रिरंगा लहराए, पर मन अधीर।
पुराने चेहरे पीछे छूटे,
नए सूरज ने उम्मीदें बूते।
पर बंटवारे की दीवारें खड़ी,
लोकतंत्र की आत्मा क्यों पड़ी?
पर जनता की शक्ति, अडिग अडोल,
हर मुश्किल को कर सकती गोल।
जन-जन में बसता यह हिंदुस्तान,
सच्चाई से होगा इसका उत्थान।
चलो सवाल उठाएं, सत्य को बुलाएं,
न्याय के दीप से अंधेरे मिटाएं।
हर वोट में, हर आवाज़ में,
भारत के भविष्य का है अरमान छिपे।