समर्पण
समर्पण त्याग बलिदान लक्ष्य
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त्याग बलिदान लक्ष्य की पूर्ति का भाव समर्पण कहलाता है
भारत राष्ट्र समर्पित काव्य की रचना ही उद्देश्य हमारा है
त्याग दान निष्ठा और धैर्य से प्राप्त सफलता तय होती है
सोच सभी की है सर्वोपरि देश समर्पण से विकास दर तय होती है
वरद पुत्र मां सरस्वती के तन मन धन राष्ट्र समर्पित हमें सुहाता है
सरल मंत्र है यह जीवन का आसानी से समझ में आता है
मानते हैं हम पुनर्जन्म को परिधि पर हैं सारी ही योनियाँ
सिर्फ मनस्वी भाग्य कर्म से ही मानव की योनि पा जाता है
मेरा यह संकलन समर्पित उन सीमाओं के रखवालो को
जिनको साहित्य समझता वो ही भारत का भाग्य विधाता है
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भावना है कविता की जननी है दूर कहीं इसका उद्गम
सार्थक भावों में ढलती है कुछ पलों में हो जाता है जनम
गर अच्छी लगे तभी पढ़िए करिए आकलन कुतर्क नहीं
गर लगता कहीं है राजनीति तो उस पर करिए तर्क नहीं
मिमिक्री नहीं ना दोआर्थी है अलग ये दुनिया कविता की
बस सिर्फ हास परिहास नहीं साधक को जरूरत कविता की
कविता के नाम पर लोगों ने इसका प्रारूप बदल डाला
बाजार में बिक रही है खुले आम पूरा रंग रूप बदल डाला
जैसे आए तुलसी कबीर भूषण दिनकर और निराला थे
दुष्यंत और अदम गोंडवी भी करते हर और उजाला थे
वैसे ही यह युग बदलेगा शाश्वत सच उभर के आएगा
दिनमान उदय होगा तय है और हर गतिरोध हटाएगा
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डॉक्टर इंजीनियर
मनोज श्रीवास्तव
यह भी गायब वह भी गायब