क्षत्रियत्व के सम्मान में

बाबर व इब्राहिम लोदी जैसे म्लेच्छ विदेशी आक्रांताओं को सबक सिखाने वाले अद्भुत शौर्य साहस व पराक्रम के धनी शरीर पर अस्सी घावों को सहन करने वाले व सौ के लगभग युद्ध लड़ने वाले अद्भुत योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा सांगा जी के विरुद्ध बोलने वाले राजनीतिक सपोलों को प्रतिक्रिया स्वरुप मेरा जवाब –
क्षत्रिय की परिभाषा गढ़ना
तेरे वश की बात नहीं।
सिंहो से गीदड़ टकराये
ये उसकी औकात नहीं।
कायर नीच नराधम जाहिल
किसको मूर्ख बनाता है।
सत्ता मद में पागल होकर
क्यों अनुराग सुनाता है।
रजपूती गौरव गाथा को
शायद तूने पढ़ा नहीं।
तेरे पुरखों ने एक युद्ध भी
मातृभूमि हित लड़ा नहीं।
नाम भी नकली काम भी नकली
तेरे संस्कार नकली।
अमर्यादित भाषा तेरी “”
माँ का पुत्र नहीं असली।
क्षत्रियों ने बलिदान किया है
भारत की इस माटी पर।
शीश झुकाकर नमन करुँ मैं
वीरों की परिपाटी पर।
तलवारों की टंकारो को “”
साँसो से तू सुन लेना।
जहाँ गिरा था रक्त क्षत्रिय का
फूल वहाँ से चुन लेना।
रजरक्षक वो शूरवीर भी
तुझको देख दुखी होते।
तेरी करतूतों पर शायद
अब तक थूक रहे होते।
तेरे नाम से गद्दारी की
सच में बदबू आती है।
भारत के शेरों को तो
“”” बस खुद्दारी भाती है।
संसद के गलियारों में,
भौं भौं भौं भौं करता है।
सिंहो के सम्मुख आते ही
गीदड़ सा तू डरता है।
आँख दिखा दे सूरज को
जुगनू की औकात नहीं।
दिन के अन्धें उल्लू सुन ले
तारों की ये रात नही ।
गिरी हुई जिव्हा से क्यों तू
इतना झूठ बोलता है।
पद पर होकर राजनीति मे
झूठी शान तोलता है।
कई गर्दनें काटी हमनें
कितनी ही कटवाई है।
भारत माँ के इन प्राणों की
तब रक्षा हो पाई है।
भारत मां भी थूक रही है
तेरे गोरखधन्धों पर।
तेरी कई पीढ़ियां पल गई
इन रजपूती कन्धों पर।
सींच लहू से मातृभूमि को
हमने कर्ज चुकाया है।
रजरक्षक होने का सच्चा
हमने फर्ज निभाया है।
-©® डॉ कुलदीपसिंह सिसोदिया कुंदन
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