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!!! राम कथा काव्य !!!

हे ! जग के ईश,
पुकारता जगदीश ।

दे दो एक आशीष,
चरणों मे नमन शीश ।

हे! गौरी पुत्र करता प्रणाम,
निर्विघ्न पूर्ण हो यह काम ।

मैं छोटा सा दीन हीन,
करता प्रयास होकर लीन ।

कर गुरु का सुमिरन,
एकाग्रचित किया ध्यान ।

जब जब धरा पर अधर्म बढ़ा,
पापियों पर पाप का नशा चढ़ा ।

सरयू तीरे अयोध्या पावन धरा,
दशरथ है राजा सुन लो जरा ।

साधु समाज हुआ बड़ा व्याकुल,
तब प्रभु आये अयोध्या के रघुकुल ।

शुक्ल पक्ष नवमी तिथि था पावन दिवस,
झूम उठा अवध बरसे खुशी के नवरस ।

राम लक्ष्मण भरत शत्रुहन राज दुलारे,
देख देख मुख देव भी करें जय जय कारे ।

नभ भी गूंज उठा सुन देवो की पुकार,
सब जन कह उठे करो प्रभू अब उद्धार ।

चौथेपन में राजा दशरथ ने सुत पाये,
राम छवि देख हर्ष से आँसू झलक आये ।

शिक्षा दीक्षा पाकर हुए प्रवीण,
सुकुमार थे फिर भी आ गए रण ।

देख ताड़का न हुए तनिक विचलित,
तजे प्राण प्रभू की वीरता अतुलित ।

खेल खेल में शिव धनुष तोड़ा,
जनक दुलारी से नाता जोड़ा ।

कैकई मंथरा से गए छले,
पिता आज्ञा पर वन चले ।

छोड़ सारे सुख तज अपनो को,
मिटाने अधर्म सङ्ग ले चले बाणों को ।

चित्रकूट में भरत से हुआ मिलाप,
सुन पिता गमन हुआ बड़ा संताप ।

भरत जैसा भ्राता नही जग में,
प्रभू बसे भरत के रग रग में ।

महल के बाहर बनाई एक कुटिया,
उसमें रहते प्यारे भरत भईया ।

दिन रात प्रभू सेवा में बिताते,
चौदह बरस गिन गिन दिन निकालते ।

इंद्र सुत जयंत ने रखा रूप काग,
मैया के पैर में मार चोंच गया भाग ।

प्रभू ने तिनके का चलाया बाण,
तीन लोक में मिली न शरण ।

नारद जी की सलाह पर आया प्रभू पास,
प्रभु ने किया एक आंख का ह्रास ।

वन वन घूमे आई रावण की बहना,
सुपर्णखा नाम उसका क्या कहना ।

काम मोह माया से प्रभु को लुभाया,
जतन जतन कर थकी फिर है डराया ।

राम अनुज का क्रोध जगाया,
काट नाक कान उसको भगाया ।

रोती बिलखती पहुंची पास खर दूषण,
ले एक विशाल सेना हुआ भारी रण ।

खर दूषण गया युद्ध मे खेत,
ढह गई सारी सेना जैसे हो रेत ।

सुन रावण अब हुआ बेहाल,
कौन नर ऐसा जिसने किया हाल ।

अब दशानन ने मारीच को पटाया,
मारीच था माहिर रचने में माया ।

मारीच ने लंकापति को समझाया,
राम नर नही उसने भेद बताया ।

मारीच बन छल का मृग पंचवटी आया,
सीताजी के मन को बहुत ही भाया ।

कंचन थी उसकी काया,
छुपी हुई थी उसमें माया ।

रख साधू वेश रावण आया,
लक्ष्मण रेखा लांघ न पाया ।

जब जानकी आई रेखा पार,
कर हरण करता जाता हाहाकार ।

जटायू ने उसको ललकारा,
हुआ युद्ध खग गया हारा ।

घायल होकर पक्षी करे पुकार राम राम ,
प्रभू मिलन की आस में रखी सांसे थाम।

वन वन प्रभू खोजे सीता मैया,
कहाँ गई मेरी वो जीवन नैया ।

पेड़ पेड़ से पूछे सीता का हाल,
दोनों भ्राता ढूंढते जाते होकर बेहाल ।

देख जटायु को सब हाल जाना,
असुर राज रावण को पहचाना ।

धन्य जटायू जिसने किया प्रभू वंदन,
साधु संत भी कर न पाए प्रभू दर्शन।

सुग्रीव से मैत्री हुई मिले हनुमान,
बालि वध कर तोड़ा उसका अभिमान ।

कर राज तिलक दिया सुग्रीव को राज,
युवराज हुए अंगद पूर्ण हुए हर काज ।

चले वानर सीता को खोजने,
प्रभू काज में अपने को साधने ।

गीध सम्पाती की दूर दृष्टि,
देख रही लंका की सृष्टि ।

समुद्र को लांघने चले हनुमान ,
श्रीराम का करते जाते गुणगान ।

पथ की बाधा को कर पार,
पहुँच गए लंका के द्वार ।

सीता सुधि ले जला कर लंका,
प्रभू के नाम का बजाया ढंका ।

प्रभू आशीष से नल नील ने सेतु बाँधा,
पानी पर शिला तेरे राम नाम साधा ।

दूत बन अंगद ने रावण को समझाया,
अपने मद में चूर था कहाँ समझ आया ।

सारे असुर अंगद के पैर को हिला न पाए,
श्री राम की महिमा का बखान करते जाए ।

बड़े बड़े वीर लंका के ढह गए,
वानर भालू श्री राम के गुण गाए ।

मेघनाद अति बलशाली किया शक्ति प्रयोग,
लक्ष्मण के उर में लगी आया दुःखद संयोग ।

सुखेन वैद्य ने संजीवनी का दिया पता बताय,
हनुमत गए रात ही रात में पूरा पर्वत ले आय ।

मूर्छा दूर हुई जागे लखन,
थाम धनुष चले कर वंदन ।

मेघनाद का किया अंत,
हर्षित हुए सारे संत ।

राम रावण युद्ध हुआ बड़ा भारी,
जितने शर काटे होता प्रलयंकारी ।

विभीषण ने दिया बताय नाभि बसे अमृत ,
सोख लिया एक शर से फिर रावण हुआ मृत ।

सुर होकर हर्षित बरसाए सुमन,
पापी का अंत होता यही सत्य वचन ।

नर वानर सङ्ग होकर किया असुरों का संहार,
धरा को पापियों से कर मुक्त किया उद्धार ।

बोलो जय श्री राम जय श्री राम,
पूर्ण होते भजने से हर काम ।

दिखा गए हमको मर्यादा का पथ,
संस्कारो का चला गए प्रवाह रथ ।

।।।जेपी लववंशी, हरदा ।।।

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