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2 Feb 2024 · 1 min read

भोर

रात्रि के वैभव के बाद
चन्द्र मलिन हो गया।
सूर्य से पराजित हो
मुँह छिपा कहीं सो गया।।

संग अपने स्वामी के
तारे भी धूमिल हो गये।
जगमगाते थे रात भर
जाने कहाँ अब खो गये।।

चहक – चहक कर पंछी
करने लगे यह शोर।
आ गयी भोर लो
फिर आ गयी भोर।।

रचनाकार :- कंचन खन्ना,
मुरादाबाद, (उ०प्र०, भारत)।
वर्ष :- २०१३.

Language: Hindi
64 Views
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