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जब-जब देखूं चाँद गगन में…..

विरह वेदना के झंकृत स्वर मंद-मंद मुस्काते हैं।
स्नेहिल स्मृतियों के झूले झूला रोज़ झुलाते हैं।।

जब-जब देखूं चाँद गगन में बस तुझमें खो जाता हूँ,
मन के सूने आंगन में पर ख़ुद को तनहा पाता हूँ,
स्वप्न सुनहरे जुगनू बनकर आँखों में छा जाते हैं-
स्नेहिल स्मृतियों के झूले झूला रोज़ झुलाते हैं।।

रात चाँदनी नागिन बनकर हर क्षण डँसती रहती है,
सुध-बुध सारा अपहृत कर मन मेरा विह्वल करती है,
व्यथित हृदय के स्पंदन फिर मुझको ख़ूब सताते हैं-
स्नेहिल स्मृतियों के झूले झूला रोज़ झुलाते हैं।।

सावन लेता हो अँगड़ाई और चले जब पुरवाई,
‘अश्क’ नयन के गीत सुनाते,पीर बजाती शहनाई,
कंपित अधरों से निकले स्वर प्रतिपल तुझे बुलाते हैं-
स्नेहिल स्मृतियों के झूले झूला रोज़ झुलाते हैं।।

© गीतकार : अशोक कुमार ” अश्क चिरैयाकोटी ”
चिरैयाकोट, जनपद-मऊ (उ०प्र०)

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