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जनता की दुर्गति

हम तो
बेमौत मारे गए
कातिल को
मसीहा समझकर!
कहीं के
ना रहे हम तो
रहजन को
रहनुमा समझकर!
इसे हमारी
बुजदिली या
जहालत ही
मान लीजिए कि!
चुपचाप
हमने कबूल किया
साजिश को
नसीबा समझकर!
#मज़दूर #किसान #मेहनतकश
#बहुजन #अवाम #public
#Political #poetry #इंकलाबी
#शायरी #दलित #आदिवासी #गरीब

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