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Nov 15, 2016 · 1 min read

अगर मैं झूठ बोलूँ

अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरा ईमान जाता है ।
मगर सच पर कहाँ मेरे किसी का ध्यान जाता है ।।

बदलते दौर में रिश्ते रहें महफ़ूज़ भी कैसे ?
कभी तक़्सीम आँगन तो कभी दालान जाता है ।। ( = विभाजित )

निगाहों में उतरने का सलीक़ा है अजब उसका ।
वो चेहरा देख कर सारी हक़ीक़त जान जाता है ।।

यही इक बात ही तेरी जुदा रहती है औरों से ।
बमुश्किल मानता है पर तू मेरी मान जाता है ।।

उसे ख़ुशबू परखने का हुनर अब तक नहीं आया ।
सुना था वो तो साये से शजर पहचान जाता है ।।

न क्यूँ बर्दाश्त कर लें हम परेशानी फ़क़त कुछ दिन ।
बुलंदी पर अगर अपना ये हिन्दुस्तान जाता है ।।

बँधी है आँख पर पट्टी तो सच आये *नज़र* कैसे ?
क़यामत पर कहाँ उसका कभी संज्ञान जाता है ।।

NAZAR DWIVEDI
8989502293

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