#लघुकथा…

#लघुकथा…
■ बाहर नहीं जाऊंगा मैं…!
【प्रणय प्रभात】
बरसों पहले दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था। जिसमें एक बच्चा उछल-उछल कर गाता था-
“एशेल वर्ल्ड में रहूंगा मैं।
घर नहीं जाऊंगा मैं।।”
सालों बाद उसी बच्चे की याद एक दबंग बुड्ढा दिला रहा था। अपने माफ़ियाई रसूख व सियासी रिश्तों के बूते। सब कुछ बच्चे वाले विज्ञापन सा ही था। बस, गीत के बोल बदल कर कुछ यूं हो गए थे-
“जेल के अंदर रहूंगा मैं।
बाहर नहीं जाऊंगा मैं।।”
लगता था कल का वही क्यूट सा बच्चा आज का एक कुख्यात माफ़िया “डॉन” बन चुका था। जिसके कुकर्म उसे बाहरी दुनिया और मौत से डरा रहे थे। नतीज़तन उसे लगाव हो गया था सलाखों के पीछे उपलब्ध सुरक्षा व सहूलियत से। जो उसे जायज़-नाजायज़ तौर पर आराम से हासिल हो रहे थे।
मतलब, खुली हवा में खुले-आम घूमते हुए औरों की हवा बरसों तक दिन-रात बन्द करने वाले ज़ालिम को अब बन्द बैरक सुरक्षित हवाखोरी का ठिकाना लग रही थी। उसके मुताबिक यह शायद कुदरत का इंसाफ़ था। जानकार इसे तंत्र के गुलाम क़ानून की पनाह मान रहे थे। दुर्भाग्य यह था कि जानकारों की मानने वाला कोई नहीं था।।
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-सम्पादक-
न्यूज़&व्यूज (मप्र)