जीवन दर्शन
मत खेल मेरे बचपन से इतना,
कर दिया तुमने भले खतना,
जीना तो है मुझे, अपनी मर्जी से,
मत बिलबिला इतना,
मुझे समग्रता के साथ जीना है,
…….
मांग भले जिससे, चाहे जितना,
मुझे दाता बनना है !
रहमतों से उसकी, वाकिफ हैं..
बांट उसे जो मिलता है !!!
…….
छोड दें उसे जो अखरता है ,
बुनियाद तो बेमिसाल है,
उसकी, जो सबका भरता है.
उभर जाता है, जो उभरता है.
……