अनेकता में एकता

अपनों के हा हुल्लड़ में शांत भाव देखना,
दूसरों के कुल्हड़ में, अतिरेक देख जाना,
टोपी मे चलते, चटाई पर हिलना ढुलना,
संख्या से उनकी, घबराकर बौखला जाना
…….
देश में भूखों मरने के हालात, कोई तो हवा
पेंचर,वैल्डिंग,बैटरी, छत,टायल लगवायेगा.
हर जगह खड़े है ,बाहर से क्या मंगवा लेगा
जमीर जिंदा है हमारा,जमीं छीन न पायेगा,
……
लीक से हट कर,धोती भले हाथ में आ जाये फटकर,
बना देंगे रुमाल, सोचिए वो भी तो किसी के काम आयेगा,
कूडा करकट फेंक देते हो, बेकार समझकर ,,
उससे रोटी बोटी खायेगा, इस देश की उन्नति खातिर,,
……
भले मार देना, गौ मांस खाने के शक में
बेचने वाला ???
बेचने वाला तुम्हारा ही बंदा, चंदा देने वाला मुस्लिम पायेगा,
तोड चाहे जितना, चुंबक के हर कण में वाम दक्षिण पायेगा,
पंख कतर चाहे जितने, हौसले बुलंद हमारे पायेगा ,,,
……..
तत्ववेत्ता महेन्द्र सिंह खालेटिया