“जिम्मेदारियों के बोझ तलें दबी परदेशी की चाहतें”:अभिलेश श्रीभारती

सूरज की पहली किरण जब उसकी खिड़की से अंदर आती है, तो उसके चेहरे पर रोशनी तो बिखेरती है, पर दिल में उजाला नहीं कर पाती। यह उजाला वैसा नहीं है, जैसा उसके गाँव की मिट्टी में खिलते हुए सूरज का होता था। वहाँ सुबह होते ही पक्षियों की चहचहाहट के साथ माँ की कोमल पुकार कानों में गूंजती थी—”बेटा, उठ जा, फ्रेश हो जा चाय नाश्ता कर ले।” वह आवाज सुनने को तो अब कान तरसती है अब तो सिर्फ अलार्म की कर्कश आवाज़ और भागते-दौड़ते शहर की चिल्लपों उसकी सुबह का हिस्सा बन चुकी हैं।
और इसे ही मैं यदि एक लेखक के तौर पर एक परदेसी होने के नाते कहूं तो”
परदेसी होना आसान नहीं होता। यह सिर्फ शहर की भीड़ में खो जाना नहीं है, बल्कि अपनी पहचान को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा देना है। गाँव की खुली हवा, मिट्टी की खुशबू, घर के आँगन में लगे नीम के पेड़ की छाँव—सबकुछ पीछे छूट जाता है। गाँव छोड़ते समय जो सपने आँखों में होते हैं, वे शहर की कठोर ज़िन्दगी में धुंधला जाते हैं। अपने घर-आँगन को छोड़कर, अपने गाँव की गलियों से दूर होकर किसी अनजान शहर की भीड़ में गुम हो जाना… यह एक ऐसा दर्द है, जो शायद सिर्फ वही समझ सकता है, जिसने इसे जिया हो।
जब वह पहली बार अपने गाँव से निकला था, तब आँखों में सपने थे और दिल में जोश। सोचा था, शहर जाकर कुछ बड़ा करेगा, अपने परिवार की तक़दीर बदलेगा। मगर शहर में कदम रखते ही हक़ीक़त ने उसे अपनी कठोर सच्चाई से रु-ब-रु करा दिया।
यहाँ हर इंसान दौड़ रहा था, पर कोई किसी का नहीं था। रिश्ते मतलब से जुड़े थे, और भावनाएँ महज़ दिखावे तक सीमित थीं। किराए के छोटे से कमरे में उसकी साँसें तो चलती थीं, लेकिन जीवन जैसे ठहर सा गया था। हर महीने कमाई का बड़ा हिस्सा घर भेजना पड़ता, ताकि माँ-बाप को भूखा न सोना पड़े, बहन की शादी में कोई रुकावट न आए, छोटे भाई की पढ़ाई न छूटे। लेकिन उसके अपने अरमान? वे भीड़ में कहीं गुम हो गए थे। उसके अपने सपने? वे जिम्मेदारियां की गहरी दरार में दब चुके थे। उनके सपने और सारे अरमान अब परदेस की इस भीड़ में दफन हो चुके थे।।
भीड़ में होकर भी वह तन्हाइयों सा अकेला था। अब त्योहार आते, पर अब वे त्योहार जैसे नहीं लगते। दीयों की रौशनी उसकी आँखों की उदासी को दूर नहीं कर पाती। होली के रंग अब फीके लगते हैं, दिवाली की मिठाइयों में कोई मिठास नहीं बची। गाँव में जब शादी-ब्याह की शहनाइयाँ बजतीं, तो वह बस फोन पर बधाइयाँ देकर अपने आंसू पी जाता। घर जाने की ख्वाहिश दिल में थी, मगर जिम्मेदारियां की जंजीरें उन्हें हर बार पैर में बांधकर उन्हें रोक देती। आखिरकार मरता क्या ना करता पुरुष जो है समाज ने उन्हें हक़ और अधिकार नहीं सिर्फ कर्तव्य दिए हैं। हर युग से वो पिता, पति और भाई बनकर अपनी जिम्मेदारियां को अपनी कर्तव्य समझकर निभा रहा है।
शहर में उसे लोग “परदेसी” कहकर पुकारते हैं, पर कोई यह नहीं समझता कि वह क्यों परदेस में आया। उसे अपने गाँव से मोहब्बत थी, पर पेट की आग ने उसे बेगाना बना दिया। हर रोज़ वह अपने दर्द को छुपाकर हंसता है, पर जब रात को वह थक कर वापस आता है, तो मोबाइल पर माँ की आवाज़ सुनाई देती है—”बेटा, खाना खा लिया?”—तब उसकी आँखें भर आती हैं। वह एक झूठी मुस्कुराहट के साथ कहता, “हाँ माँ, सब ठीक है” कहकर फोन काट देता है। उसे डर है कि कहीं उसकी आवाज़ में छिपी तन्हाई माँ न पहचान ले।।।
वह सोचता है, एक दिन सब ठीक होगा। वह इतना कमाएगा कि घर लौट सके, अपने माँ-बाप के पास बैठकर सुकून से दो वक्त की रोटी खा सके। लेकिन क्या वह दिन आएगा? या फिर वह भी उन लाखों परदेशियों की तरह, ताउम्र भागता रहेगा—एक अच्छी ज़िंदगी की तलाश में, जिसे शायद वह कभी जी ही न पाए?
पुरुष सिर्फ शरीर से मजबूत होते हैं, पर उनके दिल में भी दर्द होता है, वे भी रोना चाहते हैं, लेकिन समाज ने उन्हें मजबूत बने रहने की सीख दी है। उनकी तड़प कोई नहीं समझता। वे सिर्फ एक चट्टान की तरह खड़े रहते हैं, जब तक कि जिम्मेदारियों की बारिश उन्हें पूरी तरह घिस न दे।
परदेसी का दर्द वही समझ सकता है, जिसने उसे जिया हो। वरना दुनिया के लिए तो वह बस एक मुसाफ़िर है, जो सपनों की तलाश में कहीं खो गया है…
✍️ कहानीकार व् लेखक ✍️
अभिलेश श्रीभारती: एक परदेशी
सामाजिक शोधकर्ता, विश्लेषक, लेखक