यूं ही मंज़िल मिला न करती

उर में है एक जलती चिंगारी
कुछ कर गुजर जाने की
उर में है एक जलती ज्वाला
बरगद बन छाया देने की
तो त्याग तुम्हें तो करना होगा
विघ्नों से भी तो लड़ना होगा
यूं ही मंज़िल मिला न करती
बस एक कीमत तुम्हें चुकानी होती
चल ऐ राही,दूर का राही
चलते जा, बस चलते जा
माना पथ, तेरा आसान नहीं है
पर सपने भी तो आसान नहीं है
तम से तुम्हें तो लड़ना होगा
रात रात तो जगना होगा
यूं ही मंज़िल मिला न करती
बस एक कीमत तुम्हें चुकानी होती