एक परिंदा

एक परिंदा उड़ चला
मंजिल की तलाश में
कुछ सपने, कुछ ख्वाहिश
कुछ आशा, कुछ अरमान लिए
एक परिंदा उड़ चुका
मंजिल की तालाश में
विशाल तूफाने, राहो में विघ्न बनती़
इन तूफानों से ना डरती है ये परिंदा
कभी कष्ठ तो कभी पीड़ाए
तो कभी यात्नाए, झेलती है परिंदा
फिर भी बस एक उम्मीद में
अपना सबकुछ त्यागती है परिंदा