– गहरी खामोशी मेरी कोई समझ न पाया –
– गहरी खामोशी मेरी कोई समझ न पाया –
न अपना न ही कोई पराया,
न ही कोई मोहब्बत करने की बात करने वाला,
न ही मेरा महबूब ,मेरा परिवार ,
न कोई मेरा रिश्तेदार समझ पाया,
न कुल , वंश न ही समाज,
न जिगर न ही मेरी जान,
जिस पर था में कुर्बान,
मेरा दर्द मेरी पीड़ा ,
मेरी वेदना से में जुझता रहा ,
पर कोई भी मेरी खामोशी को न समझ पाया,
✍️ भरत गहलोत
जालोर राजस्थान