नहीं लूट लेगी पारो

घूमती फिरें गली-गली
कहे खुद को नाजुक कली
चर्चा ये सरेआम है
करती न कोई काम है
घर में सब परेशान हैं
देख हरकत हैरान हैं
दिनभर मजे उड़ाती है
सारा दिन बतलाती है
दिनभर फोन चलाती है
हर पल रील बनाती है
घूमें दिनभर आवारा
कहते हैं सभी नकारा
न बटुए में एक पैसा
करती है सबसे रैसा
अपना है जाल बिछाए
प्रेम में सबको फँसाए
हृदय में इसके खोंट है
सबकुछ बस सिर्फ नोंट है
सभी को चूना लगाया
प्रेम में अपने फँसाया
जेब पर करती घात है
लोमड़ी की यह जात है
सावधान रहना यारो
नहीं लूट लेगी पारो
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)