रिहाई सभी की होती है

हो राजा या फिर रंक कोई
विदाई सभी की होती है
बेड़ियां रिश्तों की टूटती है
रिहाई सभी की होती है
सहेजा बहुत सामानो को
अपनों के दिए निशानों को
तोहफे में मिले अपमानों को
मन की वेदना से अंजानों को
अब तो बस है, अब और कहां
अपमान की आग कचोटती है
हो राजा या फिर फिर रंक कोई
विदाई सभी की होती है
ना रूप बचेगा और ना रंग,
ना पीछे चले कोई और ना संग
बैरी कहां जब ख़त्म ये जंग
कोई बात अब नहीं झकझोरती है
हो राजा या फिर रंक कोई
विदाई सभी की होती है
चित्रा बिष्ट