“बला-ए-इश्क़” ग़ज़ल

“रतजगा उम्र भर का है”, सभी कहते क्यूँ हैं,
“बला” है “इश्क़” गर, तो फिर इसे करते क्यूँ हैं।
ज़ुल्फ़े-क़ातिल का ही, चर्चा है शहर मेँ हर सूँ,
आ के खिड़की पे फिर वो रोज़ सँवरते क्यूँ हैं।
मुस्कुराना तो, हसीनों की, इक अदा ठहरी,
फिर भी अरमान, मिरे दिल में, मचलते क्यूँ हैं।
गर किराया भी था, देना नहीं, क़ुबूल उन्हें,
फिर मिरे दिल में, मुद्दतों से वो, रहते क्यूँ हैं।
रास आया है, तग़ाफ़ुल उन्हें, है इल्म हमें,
वस्ले-ख़ातिर,मगर हम फिर भी,तड़पते क्यूँ हैं।
ख़ाक हो जाऊँ,ये मकसद है सितमगर का अगर,
फिर तो हम गिर के, बार-बार सँभलते क्यूँ हैं।
इक बिका सच न मिरा, सहर से है शाम हुई,
पल मेँ पर झूठ के अम्बार भी, बिकते क्यूँ हैं।
उस चरागर का, मरहबा करूँ कब तक “आशा”,
ज़ख़्म देता है, मगर फिर भी हम हँसते क्यूँ हैं..!
तग़ाफ़ुल # नज़रन्दाज़ करना, to neglect
वस्ले-ख़ातिर # मिलन के लिए, in a bid to meet
चरागर # हक़ीम, doctor
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