“और बताओ”

और बताओ हर पल को कैसे व्यतीत करते हो तुम।
करते हो हंसी ठिठोली या हरदम घुटते रहते हो तुम।।
पल-पल जाती घड़ियों से कुछ ख्वाब सजाते हो तुम।
यह हर बार अपने लिए समझौता चुन लेते हो तुम।।
देख किसी पक्षी को उड़ता आसमां छूने का दम रखते हो तुम।
या औंधा मुँह किये हुए धरती की धूल चखते हो तुम।।
देख दशा अपाहिज की कुछ करने की कोशिश रखते हो तुम।
या कटी टांग देख उपहास और बेचारगी का एहसास दिलाते हो तुम।।
काजू किशमिश और इलायची डाल भर-भर दूध पीते हो तुम।
यह निर्धन के लिए भी हाथ दान का आगे भी बढ़ते हो तुम।।
औरों की तरह छोड़ आए हो मात पिता को क्या वृद्ध आश्रम में तुम।
या साथ बैठकर किस्से-कहानी बच्चों संग उनसे सुनते हो तुम।।
और बताओ नींद से जाकर मौत की बातें करते हो तुम।
या अपनी ताकत पर दिन रात यूं ही इतराते हो तुम।।
चलो आज हो जाए निर्णय सही गलत का एहसास भी रखते हो तुम।
या अपने किए हर काम को हर बार सही समझते हो तुम।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”
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