महिला सशक्तिकरण की दिशा
मेरा मुस्कराता चेहरा
मुझको ही भद्दा लगता है
कथित प्रपंची कहते जब जब
रोते मन हंसना पड़ता है ।
जब से बेटी छोड़ रमायण
कॉलेजों में पढे विविधता
ऊंची शिक्षा पाकर भूले
मर्यादा रिस्तों की कविता ।
कैसे दे आशीष उन्हें मन
अहंकार में जो जकड़ा है
उसका मैं परिवार मायका
आत्म प्रवंचन लिए खड़ा है ।
पति-पत्नि स्व-स्व व्रत धारी
नहीं चाहे हितचिंतक कोई
संबंधों पर धन भारी है
राम चाहेगा होगा सोई ।
वृद्धाश्रम बना बना कर
लूट रहे यश सेवाधारी
कंधा काठी वे ही देते
आती जब मौत की वारी ।