इश्क़ और इंकलाब
क्यों न पूरी अपनी
जुस्तजू कर लें
अपने क़ातिल को
रू-ब-रू कर लें…
(१)
वो नाज़ुक अंगुलियां
क्या सुई से कम हैं
अपने चाक दिल को
चलो रफू कर लें…
(२)
दरिया के पानी में
घुल चुका है ज़हर
अपने खूने-दिल से
हम वजू कर लें…
(३)
शायद हो जाए रोशन
अब जुल्मतों का दौर
अपने आपको अगर
हम सुर्खरू कर लें…
(४)
मक़तल का ये सन्नाटा
कहीं फाड़ दे न कान
ज़ंजीरों को अपनी
घुंघरू कर लें…
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Shekhar Chandra Mitra
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