प्रिय अर्धांगनी
प्रिय अर्धांगनी आँचल सुनों तुम क्या हो
मेरे चहरे की मुस्कान भी तुम हो,
मुझको मिलता सम्मान भी तुम हो ।।
मेरे अधरों की जान भी तुम हो,
मेरे प्रियवर प्राण भी तुम हो ॥
मेरे बढते कदमों की पहचान भी तुम हो,
मेरा मान और अभिमान भी तुम हो ।।
मेरा प्यार और अधिकार भी तुम हो,
मेरे उठे सर का स्वाभिमान भी तुम हो ।।
तुम कहती हो तुम क्या हो मेरे लिए तो सुनो
हँसते चहरे की वजह तुम हो,
संतोषी जीवन की वजह तुम हो ।।
मेरे घर की शान्ति की वजह तुम हो,
दिए तीनों अनमोल रत्न की वजह तुम हो ।।
मेरे घर के मान सम्मान की वजह तुम हो,
मेरे घर मे आने वाले अतिथियों की वजह तुम हो ।।
तुम कहती हो मेरे लिए कुछ लिखते नही तो सुनो
तेरे चहरे का नूर भी मैं हूँ,
तेरे अन्तरमन में चलता फितूर भी मैं हूँ ।।
तेरे हृदय में बसने वाला हुजूरे भी मैं हूँ,
तेरे आँचल में छुप के रहने वाला सुरूर भी मैं हूँ ।।
तेरी हर परेशानी की वज़ह भी मैं,
तेरे दिल की धडकनो की धड़कन भी मैं हूँ ।।
ललकार भारद्वाज