“ख़्वाब देखे मैंने कई सारे है
वो मुझे बस इतना चाहती है,
भजन , ( अरदास कोरोना के समय) (32)
“त्याग वही है, जो कर के भी दिखाया न जाए, यदि हम किसी के लिए
लाख पतन हो जाए फिर भी हार नहीं मानूंगा मैं !
यह दुनिया समझती है, मै बहुत गरीब हुँ।
नज़्म _ पिता आन है , शान है ।
लिफाफा देखकर पढ़ते
अटल मुरादाबादी(ओज व व्यंग्य )
******** कुछ दो कदम तुम भी बढ़ो *********
मैं प्यार का इकरार कैसे करता
#गुरु ही साक्षात ईश्वर (गुरु पूर्णिमा पर्व की अनंत हार्दिक श
krishna waghmare , कवि,लेखक,पेंटर
जन्मजात जो है गरीब तो क्या?
*सहकारी-युग हिंदी साप्ताहिक का तीसरा वर्ष (1961 - 62 )*
आजादी (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)
शिद्दतों का खुमार है शायद
मैं तुमसे रूठना भी चाहू तो, रूठ नही पाता हूँ ।