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11 Jun 2023 · 1 min read

(14) जान बेवजह निकली / जान बेवफा निकली

हलकी ठोकर लगी कि तुमने बता दिया “तकदीर खफा है ”
उस “सच्चे” का कौन सहारा जिसकी जान बेवजह निकली ?

इसके भ्रमजालों से उसने मुक्त किया था केवल खुद को ,
औ” उसने कह डाला रोकर “मेरी जान बेवफा निकली ”
उस “सच्चे” का कौन सहारा जिसकी जान बेवफा निकली ?

रेशा रेशा तार हो गया , गुरिया गुरिया चूर हो गयी
दोजख दोजख बनी जिन्दगी , जिसकी जान बेवफा निकली |

अगर कहीं ईश्वर दिख जाए , पकड़ गरदनी उसकी पूछूँ
“तूने भोगा दर्द किसी का , जिसकी जान बेवफा निकली ?”

धज्जी धज्जी कपडे पहने , मतवाला सा घूम रहा है
मुर्दा बेटे की माँ जैसा , जिसकी जान बेवफा निकली |

नौजवान बेटे की अर्थी , अपने सीने से लिपटाए
पडा हुआ है बीच सड़क पर , इसकी जान बेवफा निकली |

मंडप के ही नीचे जिसकी मांग लुटी सिंदूर लुट गया
वह अभागिनी विधवा देखो जिसकी जान बेवफा निकली |

स्वरचित एवं मौलिक
रचयिता : (सत्य ) किशोर निगम

Language: Hindi
156 Views
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