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“ज़िल्द नहीं चढा सकी”

ज़िंदगी की किताब के पन्ने,
बिखरे पडे हैं कुछ इस तरह,
कि ज़िल्द भी न चढा सकी ,
हवा के रुख के साथ-साथ,
फड़फड़ाते जा रहे हैं बेतरतीब,
आंखों की नमी से कुछ पन्ने,
हो चले हैं गीले और धुंधले से,
कुछ तो खो गये जाने कहाँ,
कई बार कोशिश की मैंने,
गोंद से चिपकाने की उसे,
पर पन्ने बिखरते चले गये,
और इनके क्रम भी बिगड़ गये,
कभी शोर तो कभी सन्नाटे के बीच,
पन्नों की फड़फड़ाहट सुनती रही,
मगर वो जिल्द नही चढा सकी,
जिस पर अपना नाम लिख सकूँ||
…निधि …

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