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18 Jun 2018 · 1 min read

#ग़ज़ल-44

वज़्न– 2122-1212-2212

राह काँटों भरी मिले चलना सदा
प्यार हँसके सफ़र से ही करना सदा/1

धूप हो छाँव हो नहीं रुकना कभी
आँख तू लक्ष्य पर लगा रखना सदा/2

आँधियाँ भी चलें तुफ़ां आएँ मगर
पर्वतों-सा खड़ा अचल रहना सदा/3

काम वो जो मिसाल ही बनके रहे
और तो हाथ का रहे मलना सदा/4

दूसरों को नहीं खुदी को सीख दो
देख फिर और का बने ढ़लना सदा/5

यार तू याद रोज आता है बहुत
ख़्वाब में ही सही मगर मिलना सदा/6

चूक जाए नहीं निशाना ये तेरा(तिरा)
बाज बनके उड़ान तू भरना सदा/7

यार प्रीतम मज़े करो मिलजुल यहाँ
टूटकर साख से न तू गिरना सदा/8

-आर.एस. “प्रीतम”

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