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22 Feb 2024 · 1 min read

स्पर्श

स्पर्श वो अनूठा अद्भूत था

प्रेम बयार यूँ सीने में

चलती अनगिनत स्वप्न लिए

नयनों में स्नेह अपार था

कण कण मेरे हृदय का यूँ

तुम्हारे ही तो आधीन था

चलती तीव्र श्वासों में तो

नाम केवल तुम्हारा ही था

क्षणभंगुर जिजीविषा भी तो

जाग उठी अंतस्थल तब मेरे

सुप्त पिपासा बन अनुराग सा

पलने लगा था भीतर मेरे

मौन भी तब मुखर हो उठा

उन तीक्ष्ण उसासों की ध्वनि में

चलते रूकते निश्चय सारे

स्थिर हो उठे हॄदय में जाने

विभावरी इक पल तो ठहरती

रूमानी बनती यूँ नगरी

प्रेम सिहरन दुकूल सी हो

नव उत्कंठा सहज ही रचती।।

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