Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
13 Jun 2016 · 1 min read

मुक्तक

मेरा दूसरा मुक्तक-

अन्याय हँसे खुलकर, ये न्याय अदालत है,
निर्दोष सज़ा पाते, खूनी को’ रियायत है।
धृतराष्ट्र बने बैठे, संसद के’ सभी आका,
बस चोर डकैतों की , बेशर्म सियासत है।

दीपशिखा सागर-

Language: Hindi
Tag: मुक्तक
1 Like · 295 Views
You may also like:
✍️थोड़ी मजाकियां✍️
'अशांत' शेखर
बेटी बचाओ
Shekhar Chandra Mitra
परिस्थिति
AMRESH KUMAR VERMA
नारी को सदा राखिए संग
Ram Krishan Rastogi
“ मेरे सपनों की दुनियाँ ”
DrLakshman Jha Parimal
आस्था
Shyam Sundar Subramanian
*बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विद्यार्थी-काल की उपलब्धियाँ*
Ravi Prakash
Book of the day: मैं और तुम (काव्य संग्रह)
Sahityapedia
कौन बचेगा इस धरती पर..... (विश्व प्रकृति दिवस, 03 अक्टूबर)
डॉ.सीमा अग्रवाल
आकाश के नीचे
मनमोहन लाल गुप्ता 'अंजुम'
हृदय का सरोवर
सुनील कुमार
कुंडलियाँ
प्रीतम श्रावस्तवी
थकते नहीं हो क्या
सूर्यकांत द्विवेदी
पिता
Deepali Kalra
प्यार
विशाल शुक्ल
जान से प्यारा तिरंगा
डॉ. शिव लहरी
भोजपुरिया दोहा दना दन
महावीर उत्तरांचली • Mahavir Uttranchali
कनुप्रिया
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
मौत किसी समस्या का
Dr fauzia Naseem shad
लेखनी
लक्ष्मी सिंह
देश के हित मयकशी करना जरूरी है।
सत्य कुमार प्रेमी
कविता " बोध "
vishwambhar pandey vyagra
*!* मोहब्बत पेड़ों से *!*
Arise DGRJ (Khaimsingh Saini)
तुम चाहो तो सारा जहाँ मांग लो.....
डॉ. अनिल 'अज्ञात'
ये कैंसी अभिव्यक्ति है, ये कैसी आज़ादी
सुरेश कुमार चतुर्वेदी
याद रखना मेरी यह बात।
Anamika Singh
तुम्हारा हर अश्क।
Taj Mohammad
!!!!!! नवरात्रि का त्यौहार !!!!!
जगदीश लववंशी
"बीमारी न छुपाओ"
Dushyant Kumar
पिता का महत्व
ओनिका सेतिया 'अनु '
Loading...