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24 Jan 2024 · 1 min read

मुकद्दर

मुकद्दर की तरिणी
जब
दरिया की लहरों से
टकरा कर
हिचकोले खाते हुए
सरिता के तल में
समाने लगती है,
दिग्भ्रमित,
आशंकित।
पुरूषार्थ
तब
मांझी बन कर
जल-प्लावित
नियति को
तृण-प्रश्रय देकर
आहिस्ते-से
तट तक लाता है
एक जैतवार योद्धा-सा
और
पीठ थपथपा कर
आश्वस्त करता है,
प्रतीति दिलाता है
अपने पराक्रम की,
अपने अस्तित्व की।
भले ही मुकद्दर-ए-हयात
इतराता है,
लुभाता है,
नचाता है,
पर
पौरूषता की दिव्यता
उसे
वैभवता की पराकाष्ठा तक
ले जाने की
निमित्त बनती है।

Language: Hindi
60 Views
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