पिताजी को समर्पित

“पापा को समर्पित”

थाम के नन्हे नन्हे हाथों को मेरे

चलना मुझे सिखाया

बैठा कर अपने मजबूत कन्धों पर

ये संसार मुझे दिखाया

लड़खड़ाकर जब भी मैं गिरा

सहारा देकर मुझे उठाया

बहकने लगे जब मेरे कदम

जीने का सही रास्ता दिखाया

थकेमादे लौटे थे ऑफिस से

मेरी घूमने की जिद मानी आपने

जितना मैंने कहा मुझे घुमाया

चलते चलते थक गया मैं

धूल मिटटी से सने थे पाँव मेरे

इस सबसे बेपरवाह होकर

आपने मुझे अपनी गोद में उठाया

सुबह के भूखे थे पापा आप

पहला निवाला मुझे खिलाया

माँ की ममता माँ का प्यार

माँ का अपनापन माँ का दुलार

सबने देखा सबने सराहा

आपका सख्त चेहरा

आपका अत्यधिक क्रोध

बस यही दिखाई दिया सबको

उस सख्ती के पीछे छुपा नर्म दिल

किसी को नजर नहीं आया

छद्म आवरण थी सख्ती वो

ज़रूरी थी मार्गदर्शन के लिए

आपने ही तो जीवन पथ पर

आगे बढ़ना सिखाया

बहुत खुश होता हूँ

जब बात करते हो आप मुझसे

गर्व से फूल जाता है हृदय मेरा

जब आप सलाह लेते हो मुझसे

कभी कभी टोक देता हूँ मैं

आपकी कुछ बुरी आदतों को

पर वो आपकी वाली सख्ती

आ नहीं पाती मुझमे

आज मैं भी वहीँ खड़ा हूँ

जहाँ कभी आप खड़े रहे होगे

एक असीम अनुभूति सुखद एहसास

पितृत्व सुख पाने को आतुर

दिल में कई अरमान लिए

बस एक ही ख्वाहिश लिए अब

आप जैसा पिता बन पाऊं |

“सन्दीप कुमार”

२१/०६/२०१५

पितृ दिवस पर लिखी गयी मेरी रचना

3 Comments · 435 Views
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