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25 Sep 2023 · 1 min read

*तुम और मै धूप – छाँव जैसे*

तुम और मै धूप – छाँव जैसे
************************

तुम और मै हैँ धूप-छाँव जैसे,
शहरी हुए अब दूर गाँव जैसे।

करते भला हम प्रेम यार कैसे,
हम थे नहीं तेरे यूँ पाँव जैसे।

आवाज ऊँची पास ना करो यूं,
लगती जुबानें काँव-काँव जैसे।

दो बोल बोलो तो सही सलीके,
हर शब्द तेरा झाँव-झाँव जैसे।

अरमान मनसीरत रहे अधूरे,
खाली गये वो द्वार दाँव जैसे।
************************
सुखविन्द्र सिंह मनसीरत
खेडी राओ वाली (कैथल)

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