Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
23 May 2023 · 2 min read

चश्मे

एक के ऊपर एक
परत-दर-परत चढ़े होते हैं,
आँखों पर तरह-तरह के चश्मे।
पर, न तो
नाक पर उनके
वजन का अहसास होता है;
न ही कानों पर उनका बोझ;
इसीलिए वो समझ नहीं आते
पता ही नहीं चलते
बोध ही नहीं होता
चढ़े रहते हैं ये चश्मे
एक के उपर एक
गुरुर बनकर।
पर दूसरों के चश्मे
सहज ही दिख जाते हैं,
और हम
सहन नहीं कर पाते
दूसरों की आँखों पर चढ़े चश्मे
और तत्पर हो जाते हैं
उतारने को
दूसरों के चश्मे।
किसी और का चश्मा हटाकर,
एक चश्मा और चढ़ जाता है
हमारी आँखों पर।
गुरुर होता है कि आज
एक चश्मा उतार दिया
चढ़ा था जो उसकी आँखों पर
उसका गुरुर बनकर;
और इस गुरुर में
चढ़ जाता है
एक और चश्मा,
हमारी आँखों पर।
पर जब दिखते हैं चश्मे
चढ़े हुए दूसरों की आँखों पर
तो क्या?
वो सचमुच होते हैं उन आँखों पर
क्या वो सचमुच नज़र आ रहे हैं
या फिर
है ये हमारी आँखों पर चढ़े
चश्मों की नज़र का ही भ्रम?
क्या देख पाते हैं हम
हटाकर परे
अपनी आँखों पर चढ़े
सारे चश्मे?
क्या देख पाते हैं?
एक निर्दोष निरपेक्ष दृष्टि के साथ;
या फिर
वो चश्मे दिखते हैं तब
जब प्रकाश की किरण
विपथित हो चुकी होती है
चश्मों के लेंस से गुज़रकर,
लेंस के पदार्थ की
प्रकृति के अनुसार?
जैसे जिस तरह से
विपथित या परावर्तित
वैसे ही नज़र आने लगते हैं
उन चश्मों से चेहरे।
पर क्या?
इन चश्मों से छुटकारा
संभव है पाना,
वो जो ढलते गए हैं
शनैः शनैः
पहले
नाक, आँख, कान
और फिर
पूरे व्यक्तित्व के साथ।
क्या संभव है?
हटा पाना उन चश्मों को
जो कभी दिखते नहीं
जबकि होते हैं
हमारी नाक पर,
ठीक वैसे जैसे
दिखता नहीं कभी भी
जबकि होता है स्थिर
गुस्सा किसी की नाक पर।
प्रार्थना करता हूँ कि
छूट जाएँ ये
पर डरता हूँ कि
इन चश्मों के छूटने के साथ,
इस चश्मा चढ़ी दुनिया में
कहीं मैं अलहिदा न छूट जाऊँ;
इसीलिए, नहीं छूट पाते
ये चश्मे
क्योंकि
सच्चे दिल से ये प्रार्थना करना
नहीं संभव हो पाता है, सच में।
छोड़कर मुझे,
दिखते हैं सभी को
मेरे चश्मे,
इसीलिए कभी-कभी
उतर जाते हैं ये
जब कोशिश करता है
कोई और मेरे लिए;
चाहे कुछ पल के लिए ही
या फिर तब जब
गड़ने लगते हैं ये
खुद की ही नाक पर
होने लगती है चुभन
इनकी वजह से आँखों में,
जब कभी
मैं ही रख देता इन्हें
नाक से उतारकर
ताक पर।
और तब दिखते हैं
ताक पर रखे हुए
नाक से उतरे हुए
ये चश्मे।

(c)@दीपक कुमार श्रीवास्तव “नील पदम्”

Language: Hindi
10 Likes · 7 Comments · 135 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from नील पदम् Deepak Kumar Srivastava (दीपक )(Neel Padam)
View all
You may also like:
असली पंडित नकली पंडित / MUSAFIR BAITHA
असली पंडित नकली पंडित / MUSAFIR BAITHA
Dr MusafiR BaithA
"छ.ग. पर्यटन महिमा"
Dr. Kishan tandon kranti
छत्तीसगढ़िया संस्कृति के चिन्हारी- हरेली तिहार
छत्तीसगढ़िया संस्कृति के चिन्हारी- हरेली तिहार
Mukesh Kumar Sonkar
तुम्ही ने दर्द दिया है,तुम्ही दवा देना
तुम्ही ने दर्द दिया है,तुम्ही दवा देना
Ram Krishan Rastogi
थकावट दूर करने की सबसे बड़ी दवा चेहरे पर खिली मुस्कुराहट है।
थकावट दूर करने की सबसे बड़ी दवा चेहरे पर खिली मुस्कुराहट है।
Rj Anand Prajapati
कोतवाली
कोतवाली
Dr. Pradeep Kumar Sharma
विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली 2023
विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली 2023
Shashi Dhar Kumar
आदमी हैं जी
आदमी हैं जी
Neeraj Agarwal
मारुति
मारुति
Kavita Chouhan
!! दिल के कोने में !!
!! दिल के कोने में !!
Chunnu Lal Gupta
"नींद की तलाश"
Pushpraj Anant
*संगीत के क्षेत्र में रामपुर की भूमिका : नेमत खान सदारंग से
*संगीत के क्षेत्र में रामपुर की भूमिका : नेमत खान सदारंग से
Ravi Prakash
"निरक्षर-भारती"
Prabhudayal Raniwal
कांतिपति का चुनाव-रथ
कांतिपति का चुनाव-रथ
नंदलाल सिंह 'कांतिपति'
कुछ यादें जिन्हें हम भूला नहीं सकते,
कुछ यादें जिन्हें हम भूला नहीं सकते,
लक्ष्मी सिंह
जिन सपनों को पाने के लिए किसी के साथ छल करना पड़े वैसे सपने
जिन सपनों को पाने के लिए किसी के साथ छल करना पड़े वैसे सपने
Paras Nath Jha
कमियाॅं अपनों में नहीं
कमियाॅं अपनों में नहीं
Harminder Kaur
कजरी
कजरी
प्रीतम श्रावस्तवी
वो ख़्वाहिशें जो सदियों तक, ज़हन में पलती हैं, अब शब्द बनकर, बस पन्नों पर बिखरा करती हैं।
वो ख़्वाहिशें जो सदियों तक, ज़हन में पलती हैं, अब शब्द बनकर, बस पन्नों पर बिखरा करती हैं।
Manisha Manjari
शब्द : एक
शब्द : एक
DR. Kaushal Kishor Shrivastava
2612.पूर्णिका
2612.पूर्णिका
Dr.Khedu Bharti
अधूरी हसरत
अधूरी हसरत
umesh mehra
‘ विरोधरस ‘---10. || विरोधरस के सात्विक अनुभाव || +रमेशराज
‘ विरोधरस ‘---10. || विरोधरस के सात्विक अनुभाव || +रमेशराज
कवि रमेशराज
कृष्ण की फितरत राधा की विरह
कृष्ण की फितरत राधा की विरह
सोलंकी प्रशांत (An Explorer Of Life)
दोहा त्रयी. . . .
दोहा त्रयी. . . .
sushil sarna
"प्रेम की अनुभूति"
Dr. Asha Kumar Rastogi M.D.(Medicine),DTCD
Love is
Love is
Otteri Selvakumar
@व्हाट्सअप/फेसबुक यूँनीवर्सिटी 😊😊
@व्हाट्सअप/फेसबुक यूँनीवर्सिटी 😊😊
*Author प्रणय प्रभात*
रिश्तों का बदलता स्वरूप
रिश्तों का बदलता स्वरूप
पूर्वार्थ
नन्ही परी चिया
नन्ही परी चिया
Dr Archana Gupta
Loading...