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12 Jun 2016 · 1 min read

ग़ज़ल :– ये नीर नहीं इन आँखों के !!

ग़ज़ल –: ये नीर नही इन आखों के !!
:– अनुज तिवारी “इन्दवार”

हम डूब रहे मझधारे पर मुश्किल से भरे किनारे है !
ये नीर नही हैं आखों के ये तो गिरते अन्गारे हैं !!

हँस कर पार किये थे हम बडे-बडे तूफानो को !
अपनो ने जख्मी किये हर लम्हे यहां गवारे हैं!!

आज भँवर मे फसे-फसे हम चीख रहे चिल्ला रहे !
बचना शायद मुश्किल होगा ये नफरत के गलियारे है !!

समझ रहे थे जैसे सावन शीतल निर्मल मनभावन !
ये तपती तेज दुपहरी मे ज्वाला की बौछारें है !!

नातों के नाजुक ये बंधन ढह ना जाये ठोकर से !
जरा सम्हल कर रहना तुम ये सीसे की दीवारे हैं !!

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