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8 Jul 2016 · 1 min read

खानाबदोशी का रंग

दिन रात है भागदौड़
व्यर्थ में मची है होड़
यथार्थ और भ्रम का
यह कैसा निरर्थक नृत्य
न खुशी है, न उमंग।

न हैं पवित्र मान्यताएँ
न निश्छल भावनाएँ
न सुख है, न संवेदना
क्षणभंगुर सपनों में
बदल गया जीने का ढंग।

अंतहीन हैं अभिलाषाएँ
बेमानी हैं प्रतिस्पर्धाएँ
दम घुटाती हैं हवाएँ
दिशा-दिशा में चढ़ गया
खानाबदोशी का रंग।

© हिमकर श्याम

Language: Hindi
Tag: कविता
10 Comments · 385 Views
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