“उर्मिला: त्याग की अमर ज्योति”
“उर्मिला: त्याग की अमर ज्योति”
(रचनाकार: सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ जी महाराज)
राम कथा के हर पृष्ठ पर, नायक बनकर राम खड़े,
लक्ष्मण के त्याग की गाथा में, सेवा के दीप बड़े।
सीता के धैर्य की मूरत को, जग ने नमन किया सदा,
हनुमान के भक्ति भाव पर, भक्ति का आकाश खड़ा।
पर इतिहास की रेखाओं में, एक नाम कहीं खो गया,
जिसका त्याग, समर्पण, प्रेम — बस मौन बनकर रो गया।
वो थी उर्मिला — लक्ष्मण की संगिनी, जनकनंदिनी का मान,
जिसके तप, त्याग और प्रेम ने रचा था अद्भुत बलिदान।
जब राम संग वन जाने को, लक्ष्मण ने मन में ठाना था,
उर्मिला ने भी संकल्प लिया — “मैं भी चलूंगी” जाना था।
पर लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर, नयनों में प्रेम उमड़ा दिया,
“अयोध्या को अब तेरा सहारा है” — ये कहकर समझा दिया।
चुप रही उर्मिला, पर भीतर से उसका मन हाहाकार था,
पति-वियोग का दुख सहना, नववधू के लिए प्रहार था।
मगर प्रेम के उस पावन रूप में, उर्मिला ने त्याग किया,
अश्रुओं को पीकर भी उसने, धर्म का दीप प्रज्वलित किया।
लक्ष्मण वन में जागते रहे, और घर में तू सोती रही,
पति के धर्म को साध सके वो, तू निद्रा में खोती रही।
मेघनाद के गर्व को हरने का, आधार तेरा बलिदान था,
लक्ष्मण की विजय के पीछे, उर्मिला का तप महान था।
पिता दशरथ जब स्वर्ग गए, अयोध्या में शोक का सागर था,
हर आंख में अश्रु भरे थे, पर उर्मिला का न मन डोला था।
लक्ष्मण का दिया वचन था — “आंसू न बहाएगी तू कभी”,
अपनी पीड़ा को पी गई वो, बनकर पतिव्रता देवी।
जब जनक ने मिथिला बुलाया, उर्मिला ने मना किया,
“पति परिजन का संग ही अब, मेरा धर्म है” — ये कह दिया।
सास-ससुर का बोझ संभाला, हर पीड़ा को छुपा लिया,
पति को विजय दिलाने को, खुद को दीपक-सा जला लिया।
राम के राजतिलक के दिन, जब लक्ष्मण मंद हंसी हंसे,
लोगों ने पूछा तो बोले — “अब सोने का है समय बंधु मेरे।”
“जिसने 14 वर्षों तक जागा, उसे अब निद्रा संग जाना है,
मेरे स्थान पर जिसने सोकर, धर्म निभाया, वह उर्मिला है।”
उर्मिला के बिना लक्ष्मण का, त्याग अधूरा कहलाएगा,
उर्मिला के बिना धर्मयुद्ध का, इतिहास अधूरा रह जाएगा।
जिसकी आँखों में आंसू न थे, पर दिल में पीड़ा का सागर था,
जो हर दुख में मुस्काई रही, वो नारी अद्भुत अमर था।
सच्ची नारी, सच्ची पतिव्रता, जिसने खुद को मिटा दिया,
धैर्य, प्रेम, समर्पण वाली, जिसने अपना धर्म निभा दिया।
– सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ