हां मैं कुंभ हो आई…..
हां मैं कुंभ होआई
चढ़ा अपनी सारी जिजीविषा, सारे गिले शिकवेजीवन की
मृगमरीचिका में भटकने का सबब छोड़ा
हां मैं कुंभ हो आई
ओजस्विता प्राप्त करने हेतु चढ़ा दी सारी उत्कंठा,
जीवन की सारी पावसता विसर्जित कर आई
निरंक अश्रु लौटी तट
लेकर कुछ सुनहरी स्मृतियां
नदी का कोई खंड टूटे तो समाहित कर बढ़ा लेती नदी अपना संसार,और टूटा भाग विलीन हो जाता अक्सर ले नया आकार
वैसे ही हमारी उद्विग्न ता
विलीन होजाएगी तुम्हारी मिट्टी में मिलकर अनु प्राणित करता रहेगा का कोई ना कोई हिस्सा
कुछ अनुउत्तरित प्रश्न ,कुछ रीत पुरानी,कर दो निरुत्तर ये किस्सा
जीवन के इस संग्राम का क्यों मुझे भगीरथ बनाया
ढोती रहेंगी सांसे कब तक ये निष्प्राण शव
कब तक धरू धीर… मां ये तुम बतलाना
मांss संग तुम्हारे नीलकंठ जिसने भू पर उतारा
मांss क्या गढ़ा तुमने कोई ऐसा अश्रु ज्वार संभाले
बहे न कोई निर्दोष मेरे अश्रुवेग में
बस तब तक धीर बनाए रखना….नोचे न शव काक ..छल प्रपंची बस तब तक मुझे संभाले रखना