फरेब की दहलीज से, गुजर कर हमने देखा।

फरेब की दहलीज से, गुजर कर हमने देखा।
झूठ का बाजार सजाकर, सब खामोश बैठे हैं।
इक आहट से शिकन, दिखती है सबके माथे पर।
फरेब इतना की, झूठ के भाव में झूठ वहां बिकता है।
अलग ही दुनिया है, इन फरेब पोसो की।
झूठ का इल्म हो, फिर भी दोष गैरों को ही देते हैं।
श्याम सांवरा….