दोहा सप्तक . . . . . विविध
दोहा सप्तक . . . . . विविध
जीवन मेें ऐश्वर्य के, साधन हुए अनेक ।
अर्थ दौड़ में खो गया, मानव धर्म विवेक ।।
जीवन मेें हर बात के, होते तर्क- कुतर्क ।
कुछ ही समझे हैं मगर, इन दोनों में फर्क ।।
और- और की लालसा, मिटी न मिटे शरीर ।
भौतिक युग का आदमी, रहता सदा फकीर ।।
बाण न आये लौट कर, लौटें कभी न प्राण ।
काल गर्भ में है छुपा, साँसों का निर्वाण ।।
बीते का अफसोस क्या , कल तो है आभास ।
वर्तमान ही है सिर्फ , जीवन का मधुमास ।।
क्या जाने कब कल्पना, होगी फिर साकार ।
जीवन के इस चक्र का, किसने पाया पार ।।
भूल -भुलैया से भरा, यह सारा संसार ।
समझ न आये जीव को, जाना है किस पार ।
सुशील सरना / 22-2-25