सजल
सजल
सजल
मुखौटे डाल कर मुख पे,रहे हम दर्द को सहते।
कहे क्या अब जमाने से,नयन क्यों है सदा बहते।।
लुटाई जान थी जिन पर, सभी थे खून के रिश्ते।
किया ही क्या कहें वो अब,यही दिन रात हैं रटते।।
लबों पर मुस्कुराहट है ,नमी सी आँख में रहती।
खबर होती नहीं उनको, बड़े हम राह हैं बनते।
सँवारें काज सब उनके,उन्हें जीना सिखाया है।
बताई जब जरा गलती,जुबानी जंग हैं करते।।
जुबा चुपचाप ही हो तो, तभी सबको सुहाते हैं।
जताया रोष उनको तो, गए उनको हमीं खलते।।
रहे मतलब तभी तक ही ,मधुर व्यवहार होता है।
सधे जो काम जब उनका, उसी पल अलविदा कहते
नहीं थी प्यार की सीमा, हमारी जान दे डाली।
कमी फिर भी लगी उनको,चढ़ा कर भौंह है रखते।।
सीमा शर्मा