*प्रेम और वासना क्या है ? जाने असलम सर से।

नमस्कार दोस्तों कैसे हैं आप सब आशा करते हैं कि आप सभी मित्र अच्छे और स्वस्थ होंगे और निरंतर ध्यान में प्रवेश कर रहे होंगे और जीवन उत्साहपूर्वक जी रहे होंगे। जीवन में हम खुश होते हैं तो श्रेय स्वयं को देते हैं और दुःख में दूसरों को कोसने लगते हैं सोचते हैं हम बुद्धिमान है और बाकी सब मूर्ख दुख देने वाला। लेकिन जीवन में सत्य कुछ और होता है लेकिन हम अहंकार के कारण स्वयं से प्रश्न नहीं उठाते बस सामने वाले पर क्रोधित हो उठते हैं। हम सभी वासना में जीते हैं वासना हमें नहीं पकड़ा है हम वासना को पकड़े है जल्दबाजी में हम होते हैं जागरूकता से नहीं देखते हैं वासना दौड़ता है प्रेम ठहरता है हम या तो बाहर दौड़ लगाते हैं या मन में वासना में ही जीते हैं हम चाहे वह किसी भी चीज़ के प्रति वासना हो सकता है। चाहे कोई भी इन्द्रियां हो वासना किसी में भी हो सकता है कोई भी इन्द्रियां हमें परेशान कर सकता है। लेकिन वही प्रेम की बात करे तो वह परिणाम या किसी चीज़ पर निर्भर नहीं रहता है स्वतंत्र रूप से प्रेम होता है इंतजार करना वेटिंग देने की बात हो सब कुछ लुटाने का मन हो कुछ रह न जाए पास में। लेकिन हम सब वासना को प्रेम समझ लेते हैं और यहीं से जीवन में तनाव शुरू होता है फिर उसमें हम क्रोध घृणा को शामिल कर देते हैं। हम प्रेम कर नहीं सकते बस वासना, प्रेम करते भी हैं तो वासना के लिए मूंह पर कुछ भौतिक शब्द लिए मंज़िल तो भोगना ही रहता है कुछ शब्द शायरी में रस से बोल देते हैं इसमें कुछ प्रेमी भी होते हैं कुछ वासना ग्रसित लोग जो की प्रेमी को बदनाम करते हैं। लेकिन हम सब भौतिक शब्द को बोलकर कुछ हासिल करना चाहते हैं। निस्वार्थ भाव नहीं होता प्रेम निस्वार्थ होता है प्रेम निर्भरता पर नहीं होता बल्कि भावनात्मक होता है बिना किसी स्वार्थ के, इंतजार करते रह जाएगा पूरे जीवन अगर वह सच्चा प्रेमी है, हां मन के कारण दुखी भी होगा क्रोधित नहीं क्योंकि वह अतीत में होता है क्रोध तो वासना वाले व्यक्ति को आता है क्योंकि वह भविष्य के लिए जीता है कुछ चाहिए ही नहीं तो कैसे भी ले लूंगा, चालाकी वासना में होता है प्रेम में नहीं या तो वह मिले या कोई नही लैला मजनू के तरह। लेकिन हम चालाक लोग वासना को प्रेम से जोड़ देते हैं। स्त्रियां भी वासना को प्रेम समझ लेती है वह सोचती है मुझसे तो कर रहा है लेकिन वह चालाकियां को समझती है इसीलिए इशारा करती है न कि खुल कर बोलती है वह पुरुष को जानती है कि वह कैसे प्रभावित होंगे। लेकिन आज कल प्रेम नहीं सब शरीर बस भोगना जनता है कुछ हाथ लग जाए लेकिन हाथ कुछ नहीं लगता। क्योंकि सब क्षणभंगुर है न की स्थायी सुख नहीं। लेकिन फिर भी हम भागते हैं प्रतिदिन सोचते हैं सार्थक हो रहा है लेकिन वास्तव में हम स्वयं को मूर्ख बना रहे होते हैं। जब आप ध्यान के माध्यम से परमात्मा से परिचित होगे फिर आप एक हो जाओगे बटे हुए न रहोगे एक हो जाओगे फिर आप जब ध्यान से दृष्टि घुमाओगे फिर आप स्वयं देखोगे अगर अध्यन ठीक से हो तो आप को पता चलेगा कि काम हमारा कर्तव्य है प्रेम हमारा स्वभाव ध्यान हमारा लक्ष्य। प्रेम हमारा स्वभाव है न कि ड्यूटी न की कोई धारणा, किसी ने कहा है इसलिए नहीं, उधार का ज्ञान नहीं, मानोगे तो फिर रटने लगोगे ऐसे नही जानते रहो अंत तक जानने के बाद अपने अनुभव से, नहीं तो कोई प्रश्न उठा देगा क्यों करे क्या होगा कौन करेगा फंस जाओगे। ध्यान के बिना काम और प्रेम दोनों अधूरा है जैसे प्रकाश के बिना अंधकार। अभी आप बदले में कुछ चाहते हैं इसे व्यापार कहते हैं आप कहते हैं कुछ तो हो मेरे पास भी तभी हम सौदा करेंगे तभी हम आपसे बात करेंगे प्रेम हुआ कि व्यापार हो गया, फिर भी हम कहते हैं कि वह मुझसे प्रेम करता है या करती है वासना और व्यापार को हम प्रेम समझ लेते हैं। ऐसे नहीं साहब होश के साथ कनेक्ट रहकर देखो आप आश्वर्य में होंगे।
प्रेम और वासना दो ऐसे शब्द हैं जिनका अक्सर एक दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है, फिर भी वे बहुत अलग भावनाओं और अनुभवों को दर्शाते हैं। जहां प्रेम में एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव और प्रतिबद्धता शामिल होता है वहीं वासना मुख्य रूप से शारीरिक आकर्षण और इच्छा से प्रेरित होती है। इन दोनों के बीच के अंतर को समझने से स्वस्थ संबंध और व्यक्तिगत संतुष्टि मिल सकती है। प्रेम एक गहरा और स्थायी भावनात्मक बंधन है जो शारीरिक दिखावे से परे है। यह आपसी सम्मान विश्वास और एक दूसरे के विकास का समर्थन करने की इच्छा से पहचाना जाता है। प्रेम में अक्सर दीर्घकालिक प्रतिबद्धता होती है और यह निस्वार्थ से चिह्नित होता है, क्योंकि प्रेम में व्यक्ति एक दूसरे की खुशी को अपनी खुशी से अधिक प्राथमिकता देते हैं। प्रेम एक गहरा भावनात्मक बंधन पैदा करता है जो सतही आकर्षण से परे होता है। इसमें समय के साथ रिश्ते को पोषित करने और बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी होता है। प्रेम में साथी एक दूसरे के सपनों का समर्थन करते हैं और उनकी ज़रूरतो को समझते हैं और उन्हें मदद भी करते हैं। अगर स्वार्थ के कारण कोई प्रेम कर रहा है तो वह मूर्ख बना रहा है बदले में कुछ मिले अगर कोई इसे प्रेम कहते हैं तो वह स्वयं के साथ साथी को भी मूर्ख बना रहे हैं। दूसरी ओर, वासना किसी के प्रति तीव्र यौन आकर्षण या इच्छा है, यह अक्सर शारीरिक दिखावट पर ध्यान केंद्रित करने की विशेषता होती है। और प्रकृति में क्षणभंगुर होता है अगर होश के साथ देखे तब। जब की वासना एक रोमांटिक रिश्ते का हिस्सा हो सकता है, यह अपने आप में दीर्घकालिक साझेदारी को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। क्योंकि दौड़ किसी के साथ शुरू हो सकता है जब शरीर से काम है तो किसी भी स्त्रियां के साथ घटना घट सकता है। शारीरिक विशेषता पर आधारित एक मजबूत इच्छा होगा, आपके साथ अल्पकालित तीव्रता हो सकता है शारीरिक आकर्षण कम होने पर वासना अक्सर फीकी पड़ जाती है। प्रेम के विपरीत वासना में गहरा भावनात्मक संबंध नहीं होता है। प्रेम और वासना के बीच के अंतर करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है अगर आप ध्यान के साथ कनेक्ट ना हो तो, आप अर्थ का अनर्थ कर देंगे खासकर किसी रिश्ते की शुरुआत में। हालांकि अपने आप से कुछ महत्वपूर्ण पूछने से स्पष्टता मिल सकता है। विचार करें कि क्या व्यक्ति के साथ आपका संबंध शारीरिक भौतिक आकर्षण से परे है और क्या आप एक साथ भविष्य की कल्पना करते हैं। लेकिन नहीं मन आपका साथ नहीं देगा फिर कोई स्त्रियां को देखोगे उसके साथ भविष्य देखने लगोगे। यही होता है कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना हम अंधेरे में तीर चलाते रहते हैं जहां लग जाए। इस बात पर विचार करें कि क्या आपकी भावनाएं भावनात्मक अंतरंगता से प्रेरित है या केवल इच्छा से। प्रेम और वासना दोनों ही रिश्तों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जहां वासना जुनून और उत्साह को जगा सकती है, वहीं प्रेम एक स्थायी साझेदारी के लिए आवश्यक गहराई और स्थिरता प्रदान करता है। एक स्वस्थ रिश्ता अक्सर दोनों तत्व को संतुलित करता है जिससे सामने वाले एक संतोषजनक भावनात्मक और शारीरिक संबंध का आनंद ले पाते हैं। लेकिन ध्यान के साथ रहेंगे तभी हम पूर्ण संतुष्ट और पूर्ण आनंद के ओर बढ़ेंगे नहीं तो शरीर मन में उलझे रह जाएंगे। रिश्ते सार्थक हो सकता है जीवन निष्काम भाव के साथ भी जीया जा सकता है, लेकिन जब तक वासना हो की वह कैसे भी प्राप्त हो फिर हम हिंसा में प्रवेश करेंगे चालाकी करेंगे बस दिमाग शरीर पर रहेगा आप ऐसे में स्वयं को मुर्ख बनाते हैं सोचते होंगे सुख भोग लिया उसे दुख दिया ये सब बात पर आप खुश हो सकते हैं लेकिन वास्तव में आपके जैसा मूर्ख कोई नहीं। जब तक भोग करने वाला का पता नहीं मन परेशान क्यों करता है सत्य क्या है जब तक जानोगे नहीं तब तक सब बेकार है सब मूर्छा में होगा जो सबसे बड़ा मूर्खता होगा। याद रहे प्रेम हमारा स्वभाव है काम कर्तव्य, मूलाधार चक्र अनाहत चक्र मणिपुर चक्र आप जितने चक्र को जागृत करेंगे ध्यान के साथ वैसे वैसे आप आनंदित होते रहोगे अभी बस काम है मूलाधार पर अटके हुए हो कभी अनाहत चक्र तक आने में समय लगेगा वहीं रुक जाना नहीं और ऊपर सीढ़ी चढ़ना है ऊपर और रास्ता है अभी। फिर आप निष्काम निस्वार्थ में आ जाओगे, फिर आप क्रोध वासना घृणा लोभ ईर्ष्या स्पर्धा में रुचि नहीं लोगे बल्कि पूर्ण आनंदित रहोगे। ध्यान करते रहो आगे बढ़ते रहो।
धन्यवाद।
Aslam Sir