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11 Feb 2017 · 1 min read

II जिंदगी आंसुओं का ए सैलाब भी II

हर घड़ी वो जगाता जागो तो कभी l
राह तुम को दिखाता देखो तो कभी ll

बात कितनी हुई आसमां की मगर l
एक गजल झोपड़ी पर कहो तो कभी ll

जिंदगी आंसुओं का ए सैलाब भी l
अपने महलों से नीचे देखो तो कभी ll

बात जीवन की असली समझ से परे l
बनके दीपक किसी दर जलो तो सही ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

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