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4 Jan 2024 · 1 min read

2889.*पूर्णिका*

2889.*पूर्णिका*
🌷 पता नहीं क्यों रोने लगे🌷
1212 22 212
पता नहीं क्यों रोने लगे।
नया नया जो होने लगे।।

अजीब सा मंजर है यहाँ ।
वजूद खुद को खोने लगे।।

तलाशतें रहते जिंदगी।
खुशी सभी तो बोने लगे।।

भले बुरे रहते लोग भी ।
उदास देखो कोने लगे।।

उपासना खेदू बंदगी ।
निष्पाप अपना धोने लगे ।।
…………✍ डॉ .खेदू भारती”सत्येश”
03-01-2024बुधवार

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