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18 Sep 2023 · 1 min read

चाहत के ज़ख्म

बहुत गहरे हैं चाहत के ज़ख्म।
कैसे कहें ,कैसे जिंदा है हम।

बेवफाई कर के , चल वो दिये
हम रखे हुए हैं, वफ़ा का भ्रम।

बातों बातों में बात निकली तेरी
ढलकी रुखसारों पर क्यूं शबनम।

शख्स जो धड़कनों में बसता है
उसको‌ बेघर , कैसे करें हम ।

करीब इतने भी तुम न आओ
बिछड़ना है क्या तुझे बरहम।

दर्द दिल के‌,तुमसे‌ कैसे‌ कहे
संभाला आंखों में है तलातुम।

अपनी हर बात बाबस्ता तुमसे
अश्क भी आंख में गये हैं जम।

सुरिंदर कौर

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