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2 Nov 2023 · 1 min read

🥀*अज्ञानी की कलम*🥀

🥀*अज्ञानी की कलम*🥀
मंगल भवन अमंगल हारी,
कैसी हरि ने माया रच ड़ारी।
भौतिकता में ऐसा विदाया,
विधना ने ऐसी रचि माया।
अष्ट सिद्धि रखी अपने हाथा,
तुलसी दास ने लिखी है गाथा।
चतुर की पूंछ ज्ञानी बुद्धि हीना,
यह भी क्या कोई जीवन जीना।
सच्चे जग में फांके करते,
राम आज्ञा से ऐसे ही मरते।
धनियों की सम्पत्ति बढ़ाता,
दीन हीन भूखों मर जाता।
माया तेरी कैसी विधाता,
सकल जगत है फिर भी ध्याता।
दुखियों के घर घर में तंगी,
मानवता हो गई जग में बेढ़गी।

✍स्वरचित एवं मौलिक
जूनियर झनक कैलाश अज्ञानी झाँसी उ•प्र•

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