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5 Oct 2022 · 1 min read

💐 एक अबोध बालक 💐

डॉ अरुण कुमार शास्त्री
एक अबोध बालक 💐 अरुण अतृप्त

मैं ही राम हूँ
मैं ही रावण हूँ
भाव से परे हूँ
अनुराग से दूर
सबके सामने
सबके समीप
मुझे मत बांधना
बंधन में मित्रों
क्योंक मैं हूँ नश्वर
मेरी मजबूरिया समझो
मैं बहुत मजबूर हूँ
तन्हा हूँ तन्हाई से परे
सहानुभूति के कच्चे
अदृश्य धागे से
लेकिन बंधे
तुम जब भी
पुकारो गे
आऊँगा मैं
त्वरित वेग से
वायुमंडल की
सीमाओं से अनछुए
मेरा ठिकाना दिल में है
जो भी जब भी
मुझे दिल से मिले
मैं ही राम हूँ
मैं ही रावण हूँ
भाव से परे हूँ
अनुराग से दूर
सबके सामने
सबके समीप
मैं आत्मा हूँ
मैं पिण्ड हूँ
मैं ही सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड हूँ
सकल अभिव्यक्ति हूँ
छंद के नियमों से बंधा
कुंडलिनी सा
एक दूसरे में गुंथा
चक्र सा चक्कर हूँ
अरे अरे नहीं नहीं
सीधा सादा इंसान हूँ
नहीं घनचक्कर हूँ
बुद्धि की सीमाओं से परे
पर हृदय के दायरे में
आप सबके समीप
आप सब के करीब
मैं ही राम हूँ
मैं ही रावण हूँ
भाव से परे हूँ
अनुराग से दूर
सबके सामने
सबके समीप
क्योंकि मैं एक अबोध बालक हूँ 😊😊
💐💐💐💐💐

Language: Hindi
Tag: Poem, कविता
2 Likes · 74 Views
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