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21 Nov 2022 · 4 min read

💐💐प्रेम की राह पर-73💐💐

भाई गज़ब थी आवाज़ डेढ़ फुटिया की। जब 10:26AM(12.11.2022) को उसकी आवाज़ के परमाणु कान में प्रवेश हुए।भाई ऐसा लगा था कि जे तो ठण्डी सै।कर लो बात ठण्डी ठण्डी।चूँकि दूसरी बार में भी आवाज़ सही थी पर बेसुरी,हाँ वही डेढ़ फुटिया,बार-बार यही कहती रही कि आवाज़ नहीं आ रही है।थोड़ा तेज बोलें।नम्बर तो सेव था।मोबाइल में।चिरौंजी बहुत खुश हुई।आ गया कबूतर का फोन।ये हे।दोनों ही हाथों की अंगुलियाँ फँसा कर अंगड़ाई ली होगी।गहरी साँस छोड़ी होगी।मन ही मन खुश थी टेढ़ी।ख़ुश तो इतनी थी कि सभी डिजिटल चल रहे कार्यक्रम का अंत भी डिजिटल हो जाएगा।फिर खाऊँगी पिज़्ज़ा,लिम्का के संग।मुझे पता था कि डेढ़ फुटिया सब सुन रही है। ठीक पर अन्दाज यह था कि शाम तक ऐसी ही ठण्डी बनी रहेगी।पर हुआ यूँ कि डेढ़ फुटिया पूरी तैयारी के साथ बातों का खंज़र लिए बैठी थी।सही लो।पर वह तो बातों का देशी हथगोला लिए बैठी थी।पर उसे न पता था कि अभिषेक ने संयम का कवच पहन रखा है।लपलपाती जीव के साथ ,टेढ़ी ने कॉफी पी रखी थी।पूरे जोश के साथ नौ मिनट ग्यारह सेकेण्ड तक रूमाली के कानों में जी जी ,हाँ किये थे, ऐसे थोड़े ही होता है, हमारी भी बहिन है,तो तुमसे क्यों आदि आदि के संवाद छम्मक छल्लो की तरह जाने दिए।अँगूर के शर्बत जैसे हमारे शुद्ध शब्दों का संवाद,जी हाँ, हे लँगूरी तुम्हारे कानों में गया होगा।तो तुम्हारे लोमड़ी जैसे कान भी धन्य हो गये, हमारे शब्द सुनकर, जो कि पहली बार किसी रपटीली स्त्री के कानों में गए।शब्द लौटना चाहते थे।पर मैंने लौटने न दिए।शनैःशनैः संवाद का छोर नष्ट होता गया।पर एक बात और थी कि वह फ़ोनक्रीड़ा के अन्तिम पड़ाव पर बात करने के मूड में भी थी,ऐसा प्रतीत हो रहा था।पर हाय!डेढ़ फुटिया के मुँह से घूँघरू न बजे।बिना साज की मृदङ्ग बजाती रही।सुन्दरी।बात बात पर जूती सी मार रही थी।पर वे मुझ तक पहुँच नहीं पा रहीं थीं।यही तो था खिसियानापन कि अभिषेक के कुछ नहीं हो रहा है और न हीं कोई अंदरूनी चोट ही लग रही है।इससे और लाली जल रही होगी।ख़ाक क्यों न हो गई।कानी आँख।कागज़ पर लिखी अपनी पूरी योजना को हथोड़े से चोबे की तरह ठोंक रही थी मेरे कोमल हृदय में।।दुष्ट कितनी निर्दयी थी।एक बार तो आनन्द के शब्द उपहार में दे देती।हत्यारिन।पर क्यों देती।उसकी मम्मी ने जन्म देते ही उसे आग में फेंक दिया था।क्यों कि लडक़ी थी,पक जाएगी और उसका पकना दिल्ली में रहकर काम में आयेगा।पर यह कम्बखत ज़्यादा पक गई।और बन गई इस्पात।तभी तो झम्मनिया हमें फालतू कहल बाती है। हे लल्लललोरी, जो फालतू कहता है उसे कह देना,हमारी बराबरी पर बैठ कर कभी लिख ले।किताब ही बनकर उभरेगी।ख़ैर। धीरे धीरे सभी बात की और लपककर अपनी शादी की बात भी कर दी। झूठी डेढ़ फुटिया ने।बहुत गुरु है।बौनी।पर डेढ़ फुटिया के गाँव के पंचर वाले चाचा तो जे कैह रहे कि डेढ़ फुटिया की शादी होती तो कार्ड जरूर आता।सही लो।हम तक गाँव के पूर्व में रहें और डेढ़ फुटिया के पिताजी हमारे पश्चिम में रहें।तो बौनी की शादी अभी न हो री।सही लो।झूठी है।एक दम।बकरी जैसी आयताकार पुतलियाँ हैं रूपा की।शिकारी को चारों तरफ से देखे सै।पर वा दिन कैसे टिरटिरा रही थी।बौनी।आप सबेरे से फोन किए जा रहे हैं।फट्टू तुम न मैसेज कर री कोटेक महिन्द्रा के।ऐं है।ऐ काशी वाले उपाध्याय,खाड़ी के पास फ़ोटो खींचना डेढ़ फुटिया की और धक्का मार देना शर्बतिया में।घुल जाएगी।घुलनशील है।सही ले।तीन बटा दो फुटिया अर्थात डेढ़ फुटिया लुढ़क लुढ़क के सीधी हो जाएगी।भभकी में सभी बातें पूछना चाह रही थी रूपा।कुछ भी न मिला।हाँ यह जरूर होता कि वार्ता का सटीक सकारात्मक सामंजस्य किसी सुखद परिणाम का अविष्कार करता।परन्तु ये भड़भूजी,गिनती के चार अक्षर सीखे हुए है।वाहियात।जो स्वयं ही है।कूँद जा।उफनती नदी में।टमटू।पर अभी कहाँ कूंदेंगी।कौन सी नदी।उफन रहीं हैं।बरसात में कूदना ठीक है।हम तो प्रमाणित मनोरोगी हैं।रूपा ने कहा।इलाज करवाइए।हे डेढ़ फुटिया तुम ही कर दो हमारा इलाज।आ जाओ।सही लो।एक दम सही हो जायेंगे।तुम्हारे स्पर्श से हमारे सभी मानसिक रोग,गुप्त रोग और बाकी बचे सभी रोग।फिर क्यों जायेंगे डॉक्टर राज़ के पास।तुम्हीं बन जाना हमारी डॉक्टर राज़।एक इंजेक्शन में बबासीर खत्म किसी भी तरह का।खूनी या सूखा।सुना है तुम्हारे पास भी ऐसी ही इंजेक्सन हैं।क्यों खोपडी ख़राब।हमारे उच्चाधिकारियों के सम्पर्क में हो।योन उत्पीड़न में फँसा दो।क्यों गुल्लक।आए आए कैसे मुस्किया रही है।शरमा गई।किताब रख ली चेहरे पर।बन्दूक की नाल ने।आए हाए पिघल न जाना।शरम से।सही लो।मैं ने बटोरूँगा।डेढ़ फुटिया को।”कैसा शर्माना आज नच के दिखा दे” आए हाए।अब क्या है रूपा नाचेगी।आँगन में।भर भरा के रूपकिशोर के साथ और रूप किशोर भी लहरायेगा अपने हाथ में दक्षिणी तहमद का कोना पकड़कर।धरती काँप जाएगी और तभी गिरेगी बिजुरी।डेढ़ फुटिया पर और पहुँच जाएगी।मणिकर्णिका।वहीं रहेगी।रोती, चिल्लाती, चीखती और कभी उन्मादी हँसी के साथ।कोई पानी भी नही देगा।तुम्हें वहाँ।याद रखना।तुहरी हँसी मैं ही सुनूँगा।पर हसूँगा नहीं।तो है खिटपिट।अगर हँसा तो आवाज़ से हसूँगा।मेरे चेहरे की सत्ताईस मांसपेशियों में से एक भी तुम्हारे प्रति हँसी का अब समर्थन नहीं करेगी।मेरी मोमबत्ती।हम तो मनोरोगी हैं।तुम पीएचडी करके एक नौकरी न पा सकीं।पूरा केरियर चौपट कर लिया।अपने चिकने गालों की तरह और गा रही हो “यार बदल न जाना मौसम की तरह”।तुम्हें हे डेढ़ फुटिया एक रोजगार दूँ, थोड़ा टेबूड़ है।पर क्या करूँ,कितना मजाकी हूँ, अरे शर्म लग रही है।कोई गल न मेनू।कैह दे रहा हूँ।मर्दाना ताक़त वाली दवाईयों का विक्रय करो।ठेला का ठेला।बिक जाएगा।हमें भी बुला लेना।हम भी आ जाएंगे।विकबाने।सही लो।समझी डेढ़ फुटिया।ही ही।

©®अभिषेक पाराशर:

Language: Hindi
Tag: लेख
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